Wednesday, 8 March 2017

~** मैं एक स्त्री हूँ! **~

भावनाओं में सिमटी ;
भावनाओं से लिपटी ;
भावनाओं की गीली मिट्टी से
गुँधी हुई हूँ !
भावनाओं में ही -
बसती हूँ, बहती हूँ;
जीती हूँ, मरती हूँ;
बनती हूँ, बिखरती हूँ;
भीगती हूँ, सूखती हूँ !
कभी भीगने की आस में
सूखती जाती हूँ;
कभी सूखने की आस में
सीलती जाती हूँ !
भावनाओं की नमी ने ही
जोड़ रखा है मुझे -
तुमसे, अपने आप से -
हरेक शय से !
भावनाएँ न हों –
तो तुम कौन और मैं कौन ?
तुम कहते हो -
मैं पागल हूँ !
मैं कहती हूँ -
मैं एक स्त्री हूँ  !!!

         ~ अनिता ललित 


Friday, 20 January 2017

~** मैं...तुम हो जाती हूँ... **~

सर्दी की ठिठुरती रातें जब जमने लगती हैं,
यादें भी तेरी आ-आकर
ठहरने लगती हैं !
बनाती हूँ तब मैं ...
एक कप गरम-गरम-
तुलसी-अदरक की चाय,
जिसके उड़ते धुँए में
पिघलने लगतीं हैं...
एक-एक करके-
तेरी थमी हुई यादें!
फिर खोने लगती हूँ मैं -धीरे-धीरे …
और तब …
मैं...मैं नहीं रहती -तुम हो जाती हूँ!
       
                   ~ अनिता ललित

Friday, 25 November 2016

यादें सीपियाँ ~हाइकु

1
मन-दीपक
भाव-अँजुरी लिये
अर्पण तुझे। 

2
दो नन्हे दीप
बिटिया की आँखों के
देते हौसला।

3
जाड़े की धूप
नर्म -सा एहसास-
बेटियाँ ख़ास।

4
माँ तो लुटाती
आशीर्वाद-पोटली !
आँसू छिपाती।

5
चाँद झाँकता
झील में छिप कर
मुखड़ा देखे ।

6
सर्दी की धूप
छत पर यादों की
किताब खुली।

7
साँझ की गली
सूरज ने छिड़की 
रोली-रंगोली।

8
यादें सीपियाँ
गहराई में पैठीं
खुलें तो मोती।

9
दिल का दर्द
जब दिल में रहे
नासूर बने।

10
टूटे सपने
पलकों पर  सजें
आँखों में चुभें।

~अनिता ललित 

Saturday, 24 September 2016

**~प्यारी बेटियाँ ~**

जीवन में कुछ रिश्ते दिल के बहुत-बहुत क़रीब होते हैं -माँ, पिता, बेटा, बेटी और दोस्त ! विशेषकर 'बिटिया' तो दिल की धडकन की तरह हरपल साथ होती है !फिर उसके लिए किसी एक दिवस की कोई दरक़ार कहाँ !
ये कविता हर दिन, हर पल - सभी बेटियों को असीमित स्नेह एवं शुभकामनाओं सहित समर्पित ~

भोर सी सुहानी होती हैं बेटियाँ !
पाँव पड़ते ही जिनके
हो जाता है घर में उजाला,
सूरज की किरणों सी-
बिछ जाती हैं,
ढक लेती हैं,
हर अँधेरे कोने को
अपनी सुनहरी आभा से !

रिमझिम बूँदों सी होती हैं बेटियाँ !
मचलती, थिरकती, गुनगुनाती
भिगोती, मन लुभाती,
मिटा देती हैं थकन
और आँगन का सूनापन
अपनी चंचल किलकारियों
और अंतहीन
मख़मली बातों से !

मंदिर की घंटियों सी होती हैं बेटियाँ !
गूँजती रहती है जिनकी बातें
कानों में
और थपथपाती हैं
दिलों के द्वार,
लेकर मन में
चंदन की सुगंध,
कर देती हैं पावन
हर उस शय को
जो होती है उनके आसपास
अपने स्नेहिल स्पर्श से !

माँ की दुआओं सी होती हैं बेटियाँ
जो रहती हैं बन कर परछाईं
पिता और भाई के साथ !
बचाती हैं हर संकट से उन्हें,
संभालती हैं
हर मुश्किल घड़ी में ,
देकर मज़बूत सहारा
अपने विश्वास का,
थामती हैं, भरमाती हैं
अपनी मासूम संवेदनाओं से !

चोट पर मलहम सी होती हैं बेटियाँ
खींच लेती हैं
हर दर्द को ,
सहलाती हैं प्यार से,
धोती हैं अपने आँसुओं से
उस ज़ख़्म को,
जो दिखता नहीं किसी को
पर महसूस करती हैं वो
अपनी आत्मा की गहराई से !

शीतल चाँदनी सी होती हैं बेटियाँ !
देती हैं सुक़ून,
ग़म के घने बादलों को
हटाकर,
मिटाकर अँधेरी-स्याह रातों की
कालिमा,
उबारती हैं,
देती हैं हिम्मत
अपने मासूम आश्वासनों
और स्निग्ध,
निश्छल मुस्कानों से !

घर का उल्लास होती हैं बेटियाँ,
हर दिल की आस होती है बेटियाँ,
पूजा की ज्योत होती हैं बेटियाँ,
बरसता है ईश्वर का नूर सदा उस दर पर,
हँसती-खिलखिलाती हैं जिस घर में प्यारी बेटियाँ !!!

~अनिता ललित 

Thursday, 22 September 2016

~**बचपन की गलियाँ (माहिया)**~

1
सपनों में आती हैं
बचपन की गलियाँ
यूँ पास बुलाती हैं।

2
चिटके सुख का प्याला
जैसे उम्र ढले
विष सी जीवन-हाला।

3
भाए ना जीवन को
दुनिया के मेले
ठेस लगे जब मन को।

4
पीड़ा मन की गहरी
आँखों से छलके
पलकों पर आ ठहरी।

5
सपन करे हैं बैना
बन के किर्च चुभें
सोना भूले नैना।

~अनिता ललित